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آخر وصیه للقاضی محمد رئیس جمهوریه کوردستان

 

 آخر وصیه للقاضی محمد رئیس جمهوریه کوردستان قبل إعدامه شنقا

 

یا أبنائی وإخوتی الأعزاء !

یا إخوتی الذین هضمت حقوقهم!

یا شعبی المظلوم !

ها أنا ذا فی اللحظات الأخیره من حیاتی، أقدم لکم بعض نصائحی: ـ تعالوا أناشدکم بالله أن لا یبغی بعضکم على بعض.. توحدوا وتعاضدوا.. اثبتوا أمام عدوکم.. لا تبیعوا أنفسکم لعدوکم بثمن بخس.. وإنَّ تودّدَ عدوکم لکم محدود، وینتهی حین تتحقق أهدافه.. فهو لا یرحمکم أبدا، ومتى وجد الفرصه واستنفدت أغراضه، فانه ینتقم منکم لا محاله ولا یعفو عنکم ولا یرحم. إن أعداء الکورد کثیرون، هم ظلمه، مستبدون ولا یرحمون.. وعلامه وطریق نصر أی شعب أو امه، یکمن فی وحدتهم وإتحادهم، وکذلک فی المناصره، وإلا فهم یرزحون تحت وطأه المتجبرین.

أیها الشعب الکوردی ! لستم بأقل من أی شعب على وجه البسیطه، إنما انتم فی الرجوله والشهامه والقوه متقدمون على کثیر من الشعوب التی تحررت.. فالشعوب التی تخلصت من قبضه المستبدین، هم أمثالکم، ولکن اولئک کانوا متحدین.. کفتکم العبودیه.. وإن تحررکم مرهون فقط بالوحده ونبذ الحسد ورفض العماله للأجنبی ضد شعبنا.

إخوتی! لا یخدعنکم العدو.. فعدو الکورد عدو ایا کان لونه وجماعته وقومه.. لا شفقه له ولا ضمیر، ولا یرحمکم، ویوقع بینکم الفتنه والتقاتل، ویثیر بینکم الأطماع.. وعن طریق الخدعه والأکاذیب، یُحرضُ بعضَکمْ ضد بعض. وهکذا کانوا دائما، فالبغض والکراهیه متأصلان فیهم طوال التأریخ ولحد اللحظه. أنظروا کیف تعاملوا مع زعماء شعبکم، بدءاً ب " إسماعیل آغای شکاک " وإنتهاء بأخیه جوهر آغا وحمزه المنکوری وآخرین کثر.. لقد خدعوهم جمیعا، حیث تعاملوا معهم بالمرونه واللین فی البدایه، ومن ثم فرقوا جمعهم وشملهم، وأخیرا قاموا بکل خسه ودناءه بتصفیتهم.. لقد خدعوهم بأن أقسموا لهم بالقرآن، وأوحوا إلیهم بأن نیه العجم تجاههم صافیه وانهم یحسنون صنعا معهم. ولکن وا أسفاه على سرعه تصدیق الکورد الذین إنخدعوا بیمین وعهود العجم التی قطعوها لزعماء الکورد، وکل ما قطعوه لم یتجاوز حدود الکذب والخداع. لذا، أناشدکم وکأخ صغیر لکم بالله، وأقول : إتحدوا ولا تتفرقوا.. وتیقنوا بأن العجم لو منحوکم العسل، فانهم یدسون السم فیه. لا یخدعنکم قسم وعهود العجم.. فإنهم لو حلفوا یمینا وبالقرآن ألف مره ووضعوا أیدیهم علیه ووعدوکم، حینئذ تأکدوا بأنهم یریدون خیانتکم ومخادعتکم.

ها أنا ذا فی اللحظات الأخیره من حیاتی، أنصحکم لله.. أقول لکم بأن ما کنت قادرا على فعله قد فعلته، والله أعلم.. لم أقصر فی تقدیم النصائح وتبیان الطریق الصحیح.. والآن وفی هذا الوقت والحال، أعیده علیکم واطالبکم بألا تنخدعوا أکثر بالعجم ولا تصدقوا حلفهم بالقرآن ولا بعهودهم وعقودهم، لأنهم لا یعرفون الله ولا یؤمنون به ولا برسوله ولا بیوم القیامه ولا بالحساب والکتاب.. وما دمتم کوردا، فانکم فی نظرهم مجرمون ومحکومون، حتى لو کنتم مسلمین.. من اجل ذلک، فإن رؤوسکم وأموالکم وأرواحکم مباح وحلال بنظرهم، ویعتبرون کل ما یقومون به ضدکم هو غزوه.

ما کنت أتمنى أن أغادر الحیاه واترککم وأنتم تعانون من ظلم هؤلاء الأعداء الحاقدین.. لقد فکرت کثیرا فی ماضینا ورؤساءنا الذین خدعهم العجم بالیمین والکذب والحیل ومن ثم ألقوا القبض علیهم وبالتالی قتلوهم.. وقد حدث هذا بعد أن عجزوا عن هزیمتهم والإنتصار علیهم فی معارک البطوله ولم یصمدوا أمامهم، فاقدموا وعن طریق الکذب والإحتیال والدجل على خداعهم وبالتالی قتلهم.

أنا أتذکر کل ما حصل لأولئک الزعماء، ولم أثق فی یوم ما بالعجم.. وقبل أن یعودوا إلى هنا، وعن طریق الرسائل والتوصیات وإرسال شخصیات کوردیه وفارسیه، وعدوا وعاهدوا کثیرا ومن دون أی وفاء بهما بأن دوله العجم وعلى رأسها الشاه ترید لهم الخیر ولیس فی نیتها أن تسقط قطره دم واحده فی کوردستان.. وها أنتم الآن ترون بأم أعینکم نتائج الوعود التی قطعوها.. ولو أن رؤساء القبائل والعشائر لم یخونوا ولم یبیعوا أنفسهم للعجم، لما حصل لنا ولکم ولجمهوریتنا ما حصل.

نصیحتی ووصیتی لکم هی: أن تحثوا أبناءکم على طلب العلم، فإننا لسنا بأقل من الشعوب الأخرى ولا ینقصنا شئ غیر العلم.. تعلموا، حتى لا تتأخروا عن رکب الشعوب.. فالعلم لدى عدوکم هو سلاحه القاتل فی وجهکم. تأکدوا لو أنکم إتفقتم وإتحدتم وأولیتم العلم إهتمامکم، فانکم سوف تنتصرون على أعداءکم نصرا عزیزا. لا ینبغی أن یُحبطکم ویقضی على عزیمتکم مقتلی ومقتل أخی وأبناء أعمامی، لأنه ومن أجل أن تصلوا إلى آمالکم وأهدافکم، یجب أن یقدِّم الکثیر من أمثالنا التضحیات من أجلها.. وأنا على یقین بأن هناک الکثیر من الآخرین الذین سوف یُقضى علیهم بالحیل والنفاق.

انا على قناعه بأن هنالک الکثیر من الذین هم اعلم وأقدر منا، سوف یقعون فی شرک وخداع ومؤامرات الأعاجم.. لکننی آمل أن یکون مقتلنا درسا وعبره للمخلصین من أبناء الشعب الکوردی.

لدى نصیحه أخرى وهی : ان ترجو من الله سبحانه وتعالى أن یکون نصیرکم ومعینکم فی نضالکم من أجل هذا الشعب.. حینئذ أکون على ثقه بانه سوف یمدکم من عونه.

قد تسألوننی لماذا لم أنتصر وأفز ؟! وعند الجواب اقول لکم : والله لقد إنتصرت وفزت.. أی نعمه وأی نصر وفوز اکبر من أن أفدی برأسی ومالی وروحی فی سبیل شعبی ؟! تأکدوا بأن مطلبی فی الحیاه کان أن اموت موته تجعلنی وأنا أواجه الله والرسول وشعبی وقومی، مرفوع الرأس.. إن هذه الموته هی نصر لی.

أحبائی ! کوردستان هی بیت الجمیع.. کما أن کل فرد فی البیت یقوم بعمل محدد فیه ولا یحتاج الأمر أن یتدخل الآخر فی شأنه، وکذلک الأمر مع کوردستان، فإن مثلها کمثل البیت.. عندما تعرفون بأن عضوا فی هذا البیت بإمکانه القیام بعمل ما، دعوه لیعمل، ولیس هناک داع ومسوغ لوضع العوائق أمامه او تکتئبوا وتأخذکم الغیره لکون أحدکم تحَمَّل المسؤولیه الکبرى.. لأنه حینما یتحمل شخص ما عملا عظیما ویدیره، یعنی هذا أنه عالم به ویحمل على عاتقه مسؤولیه عظمى أمام هذا الواجب.

تأکد بأن الکوردی أفضل لک.. والعدو یحمل البغض والکراهیه فی قلبه.. ولو لم اکن أتحمل مسؤولیه کبیره على عاتقی، لما کنت الآن واقفا تحت حبل المشنقه.. لذا یجب ان لا یستبد بکم الطمع تجاه بعضکم.

الذین لم ینفذوا أوامرنا، لم یقتصروا فقط على عدم التنفیذ والطاعه فحسب، إنما عادونا أیضا.. وبما أننا إعتبرنا أنفسنا خداما لشعبنا، فهم الآن فی بیوتهم وبین أولادهم، ینامون وهم مرتاحوا البال.. لکننا بسبب کوننا خداما لشعبنا، ها نحن الآن واقفون تحت حبل المشنقه، وأنا بصدد إنهاء آخر لحظات حیاتی بهذه الوصیه.. ولو لم أکن أتحمل المسؤولیه الکبرى، کنت أغط الآن فی نوم عمیق.

وهذه النصیحه التی اقدمها لکم، هی أیضا من إحدى المهام التی على عاتقی.. وانا على یقین بأنه لو کان هناک شخص آخر تحَمّل مسؤولیاتی، لاصبح هوالآن فی مکانی تحت حبل المشنقه.

وأنا الآن ومن أجل أن أرضی الله وطبقا للمسؤولیه التی على عاتقی، وککوردی خادم للشعب ومن اجل العمل الطیب ( الأمر بالمعروف ) قدمت لکم بعض النصائح.. أرجو ان تاخذوا منها لاحقا العبر وان تنصتوا إلیها تماما، على أمل أن ینصرکم الله تعالى على أعداءکم : ۱ـ أن تعتقدوا بالله و ( بما جاء من عند الله ) وتعبدوه، وتؤمنوا برسوله ( صلى الله علیه وسلم ) ویکون أداؤکم للفرائض الدینیه قویا ومتینا. ۲ـ احفظوا وحدتکم وإتفاقکم فی صفوفکم.. لا تقترفوا الأعمال المشینه تجاه بعضکم، ولا تکونوا طماعین ولاسیما عند تسلم المسؤولیه. ۳ـ إجتهدوا فی رفع مستوى الدراسه والعلم ودرجه تحصیلکم، حتى لا تنخدعوا بالعدو کثیرا. ۴ـ لا تثقوا بالأعداء، لاسیما العجم، لأنهم یعادونکم بأشکال مختلفه، فهم أعداء شعبکم ووطنکم ودینکم. والتأریخ أثبت بأنهم یبحثون عن کل ذریعه للإیقاع بکم، ویقتلوکم لأدنى سبب ولا یتورعون عن القضاء على الکورد بتاتا. ۵ـ لا تبیعوا أنفسکم للعدو طمعا فی بقاء زائل فی هذه الدنیا الدنیه، لان العدو هو نفس العدو ولا یمکن الإعتماد علیه. ۶ـ لا یخن بعضکم بعضا، لا فی السیاسه ولا فی الأرواح ولا فی الأموال ولا فی الأعراض.. لأن الخائن ذلیل ومجرم عند الله والناس، والمکر السئ یحیق بصاحبه فی الأخیر. ۷ـ لو أن أحدا منکم تمکن من أداء اعمالکم، فتعاونوا معه، ولا یجعلنکم الإستئثار والطمع أن تقفوا ضده أو لاسامح الله أن تتجسسوا علیه لصالح العدو. ۸ـ المذکور فی وصیتی هذه، هو من أجل صرفه على المساجد والمستشفیات والمدارس.. علیکم أن تطالبوه جمیعا وتستفیدوا منه. ۹ـ لا تتوقفوا عن النضال والدأب والجهاد، حتى تتحرروا کباقی الشعوب من نیر الأعداء.. لا قیمه لمال الدنیا.. لو أصبح لکم وطن وإمتلکتم الحریه وأصبحت أموالکم وأرضکم ووطنکم لکم، عند ذاک یمکن ان یقال بأنکم حقا أصحاب أموال وثروه، وکذلک أصحاب دوله وعزه. ۱۰ ـ ما أظن أن لأحد علی حق، سوى حق الله.. ولکن لو أن أحدا یعتقد أن له علیّ حق، فإننی ترکت ثروه کبیره، فلیذهب إلى الورثه ویأخذه منهم.

ما دمتم غیر متوحدین، فإنکم لن تنتصروا.. لا یظلم بعضکم بعضا، لأن الله یقضی على الظالم بأسرع وقت ویخزیه.. وهذا وعد الله من دون زیاده أو نقصان.. الظالم سوف یسقط ویخزى، والله ینتقم من ظلمه.

آمل أن تأخذوا بنصیحتی، وأن ینصرکم الله على الأعداء، وأقول کما قال الشیخ سعدی: مراد ما نصیحت بود و کوفتیم حوالت با خدا کردیم و رفتیم یعنی: کان قصدنا مجرد نصیحه وقلنا وسلّمنا الأمر لله وذهبنـــــــــــا

خادم الشعب والوطن القاضی محمد

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